स्वतंत्रताके समयका एवं आजका भारत !

१९४७ में जहां १ पैसेका भी ऋण नहीं था, उस भारतमें आज प्रत्येक नागरिक अपने सिरपर ३२,८१२ रुपयोंके ऋणका भार ढो रहा है । १९४७ में ३३ प्रतिशतसे अधिक निर्यात करनेवाला भारत आज १ प्रतिशतसे भी अल्प निर्यात कर रहा है । जहां अधिकसे अधिक १० से २० विदेशी प्रतिष्ठान थे, उस
भारतमें आज ५,००० से भी अधिक विदेशी प्रतिष्ठानोंको सिरपर उठाया जा रहा है । जहां एक भी संवेदनशील जनपद (जिला) नहीं था, उस भारतमें आज ३०० से भी अधिक जनपद संवेदनशील बन गए हैं । जहां प्रति नागरिक एक-दो गौएं होती थीं, उस भारतमें अबाध गोहत्याके कारण आज १२ व्यक्तियोंपर एक गाय है । विदेशमें जाकर अत्याचारी कर्जन वाइली, ओडवायर जैसे शासकोंको ईसावासी करनेवाला भारत आज संसदपर आक्रमण करनेवाले अफजलको फांसी देनेसे कतरा रहा है !
देशाभिमान जागृत रखनेवाले भारतसे, देशाभिमान गिरवी रखनेवाला भारत, निम्नतम भ्रष्टाचार करनेवाले भारतसे भ्रष्टाचारकी उच्चतम सीमातक पहुंचा भारत, सीमापार झंडा फहरानेवाले भारतसे आज नहीं तो कल, कश्मीरसे हाथ धो बैठनेकी प्रतीक्षा करनेवाला भारत… यह सूची लिखते समय भी मन आक्रोशित हो रहा है; परंतु ‘गणकी तो दूर, मनकी भी लज्जा न रखनेवाले’ शासनकर्ता सर्वत्र गर्वसे सीना तानकर घूम रहे हैं । मुसलमान आक्रमणकारियों एवं धूर्त ब्रिटिशोंने भी भारतीय जनताको जितना त्रस्त नहीं किया, उससे सैकडों गुना लोकतंत्रद्वारा उपहारस्वरूप मिले इन शासनकर्ताओंने मात्र ६ दशकोंमें कर दिया है !
‘लोगोंद्वारा, लोगोंके लिए, लोगोंका शासन’, लोकतंत्रकी ऐसी व्याख्या, भारत जैसे विश्वके सबसे बडे देशके लिए ‘स्वार्थांधोंद्वारा स्वार्थके लिए चयनित (निर्वाचित) स्वार्थी शासनकर्ताओंका शासन’, ऐसी हो चुकी है ।
इस लेखमालिकामें भारतकी अनेक समस्याएं वर्णित हैं । ये समस्याएं पढकर कुछ लोगोंके मनमें संदेह उत्पन्न होगा कि ‘हिन्दू राष्ट्र’में ये समस्याएं दूर कैसे होंगी ? क्या इतिहासमें ऐसा कभी हुआ है ? ऐसा समझनेवाले लोग यह समझ लें कि – हां, इतिहासमें ऐसा हुआ है ! छत्रपति शिवाजी महाराजका ‘हिन्दू राष्ट्र (हिंदवी स्वराज्य)’ स्थापित होते ही ऐसी तत्कालीन समस्याएं दूर हुई हैं !


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