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सरकार है या मौत की फैक्ट्री..?

असली पप्पू तो ये चाय वाला निकला 9 महीने बाद पता चला पप्पू फेल हो गया हैं. गरीबी मिटा देने की बातें सिर्फ बातें हैं, जो दौलत के भूखे हैं वह गरीबी क्या मिटाएंगे, गरीब को मिटा सकते हैं गरीबी नहीं, तस्वीरें गवाह हैं !! रेल से मौत, अस्पताल से मौत, पत्रकारिता से मौत, नोटबंदी से मौत, जीएसटी से मौत, व्यापम से मौत..?? मौत ही मौत..? सरकार है या मौत की फैक्ट्री..? कुछ तो गड़बड़ है जालिम तेरे किरदार में,
वारना इतने हादसे नही होते किसी सरकार में!!!!

सियासत मुल्क़ में इस कदर अवाम पे एहसान करती है

सियासत मुल्क़ में इस कदर अवाम पे एहसान करती
है
पहले आँखे छीन लेती है फिर चश्में दान करती है…

कालका मंदिर पर चल गया बुलडोजर

मंदिर तोड़ विकास !! कालका मंदिर पर चल गया बुलडोजर मौलवी इस्लाम का प्रचारक होता है पुजारी पेट पालता है, पुजारी का आम सरोकार होता नहीं ================================= दिल्ली के कडकडडूमा कोर्ट के पास प्रसिद्ध कालका मंदिर तोड दिया गया, उस बुलडोजर चल गया। हिन्दूवादियों की कोशिशें असफल हुई। मंदिर को बचाने के लिए बीस हिन्दू भी नहीं पहुंचे। जबकि मनोज राघव जैसे हिन्दूवादियो ने पूरी दिल्ली को अगाह किया था। मुझे भी आक्रोश है। समस्या अपने घर में हैं। मौलवी इस्लाम का प्रचारक होता है, वह मस्जिद से बाहर भी जाकर सबको एकत्रित करता है, संगठित रखता है, इस्लाम के प्रति समर्पित रहने की प्रेरणा देता है जबकि पूजारी सिर्फ कर्मकांड और चढावे में ही व्यस्त रहता है, आम हिन्दुओ से उसका सरोकार नहीं होता है, हिन्दू धर्म से उसका कोई खास लगाव नहीं होता है, वह निचले वर्ग से घृणा भी करता है। अगर पूजारी हिन्दुत्व के लिए प्रेरित करने का काम करे और हिन्दुत्व के प्रति आस्था जगाये तो फिर मंदिर पर बलिदान होने के लिए सैकडों लोग सामने होंगे। कडकाडूमा कोर्ट का कालका जी मंदिर इसका उदाहरण है बचाने कोई आया नहीं। मंदिर टूटेन से कैसे बच…

मोदी, नेहरू से लड़ते लड़ते अपने भाषणों में हारने लगे हैं

नेहरू से लड़ते लड़ते अपने भाषणों में हारने लगे हैं मोदी प्रधानमंत्री मोदी के लिए चुनाव जीतना बड़ी बात नहीं है। वे जितने चुनाव जीत चुके हैं या जीता चुके हैं यह रिकार्ड भी लंबे समय तक रहेगा। कर्नाटक की जीत कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन आज प्रधानमंत्री मोदी को अपनी हार देखनी चाहिए। वे किस तरह अपने भाषणों में हारते जा रहे हैं। आपको यह हार चुनावी नतीजों में नहीं दिखेगी। वहां दिखेगी जहां उनके भाषणों का झूठ पकड़ा जा रहा होता है। उनके बोले गए तथ्यों की जांच हो रही होती है। इतिहास की दहलीज़ पर खड़े होकर झूठ के सहारे प्रधानमंत्री इतिहास का मज़ाक उड़ा रहे हैं। इतिहास उनके इस दुस्साहस को नोट कर रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपना शिखर चुन लिया है। उनका एक शिखर आसमान में भी है और एक उस गर्त में हैं जहां न तो कोई मर्यादा है न स्तर है। उन्हें हर कीमत पर सत्ता चाहिए ताकि वे सबको दिखाई दें शिखर पर मगर ख़ुद रहें गर्त में। यह गर्त ही है कि नायक होकर भी उनकी बातों की धुलाई हो जाती है। इस गर्त का चुनाव वे ख़ुद करते हैं। जब वे ग़लत तथ्य रखते हैं, झूठा इतिहास रखते हैं, विरोधी नेता को उनकी मां की भाषा में बहस की चु…

जनता अपनी आस्था और बुद्धि क्यों आसाराम जैसों के पास गिरवी रख देती है?

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उमा भारती ने मध्य प्रदेश में अपने मुख्यमंत्रीकाल में विधानसभा के अंदर आसाराम के प्रवचन कराए थे तो पूरे मंत्रिमंडल के साथ सत्ता पक्ष के सारे विधायकों के लिए उसे सुनना अनिवार्य कर दिया था. भक्तों के बीच आसाराम (फोटो साभार: फेसबुक/आसाराम) जोधपुर में विशेष एससी-एसटी अदालत के जज मधुसूदन शर्मा द्वारा वहां की सेंट्रल जेल में शाहजहांपुर की एक अवयस्क लड़की से बलात्कार के दोषी आसाराम को उम्रकैद की सजा सुनाने से खुश पीड़िता के पिता भले ही यह महसूस करते हुए कि उन्हें इंसाफ मिल गया है, अपनी लड़ाई में साथ देने वालों का शुक्रिया अदा कर रहे और उम्मीद जता रहे हों कि अब मामले के उन गवाहों को भी न्याय मिलेगा, जिनकी हत्या कर दी गई या अपहरण कर लिया गया, लेकिन देश की न्यायप्रणाली में प्रायः नजर आ जाने वाले छिद्रों के मद्देनजर अभी यह नहीं कहा जा सकता कि आसाराम वाकई अपने अंजाम को पहुंच गये हैं या उन्हें ‘करनी का फल’ मिल गया है. अकारण नहीं कि पीड़िता के पिता के बरक्स आसाराम ने सजा सुनाये जाते वक्त हताश-निराश दिखने के बावजूद एक बार भी यह नहीं जताया कि इससे उन्हें अपने अपराध का किंचित भी बोध हुआ है, जबकि उनकी प्रव…

Yogi Adityanath BJP की सारी ढोंगी निकाल दी और Rss वालो को भी नहीं बक्शा...

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पद्मावती विवाद और राजपूत ###########

*पद्मावती विवाद और राजपूत
राजस्‍थान के राजपुतों में भयंकर गरीबी है। शायद जाटों से भी ज्‍यादा। ३० प्रतिशत के आसपास बीपीएल होंगे। काश कि कभी ये रोजगार के लिए सड़कों पर उतरते। पर नहीं, उतरेंगे तो कभी गैंगस्‍टर आनंदपाल के लिए और कभी पद्मावती के लिए।
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लेकिन ये तो आजकल हर जाति में हो रहा है। *हर कोई अस्मिता के लिए सड़कों पर उतर रहा है, मुर्ति के लिए उतर रहा है पर रोजगार के लिए नहीं। इसका मूल कारण कोई एक जाति नहीं बल्कि देश में एक क्रान्तिकारी आन्‍दोलन की अनुपस्थिति है जिसके कारण तमाम प्रतिक्रियावादी जनता को गलत रास्‍ते पर ले जाने में सफल हो रहे हैं।* *शहीदे आजम भगत सिंह* ने कहा था “जब गतिरोध की स्थिति लोगों को अपने शिकंजे में जकड़ लेती है तो किसी भी प्रकार की तब्दीली से वे हिचकिचाते हैं। इस जड़ता और निष्क्रियता को तोड़ने के लिये एक क्रान्तिकारी स्पिरिट पैदा करने की ज़रूरत होती है, अन्यथा पतन और बर्बादी का वातावरण छा जाता है।… लोगों को गुमराह करने वाली प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ जनता को ग़लत रास्ते पर ले जाने में सफल हो जाती हैं। इससे इन्सान की प्रगति रुक जाती है और उसमें गतिरोध आ जाता ह…