भारतीय संस्कृति के हित में इस कविता को भी याद रखना चाहिए-

अँग्रेजी सन को अपनाया,
विक्रम संवत भुला दिया है...
अपनी संस्कृति, अपना गौरव
हमने सब कुछ लुटा दिया है...
जनवरी-फरवरी अक्षर-अक्षर
बच्चों को हम रटवाते हैं...
मास कौन से हैं संवत के,
किस क्रम से आते-जाते हैं...
व्रत, त्यौहार सभी अपने हम
संवत के अनुसार मनाते हैं...
पर जब संवतसर आता है,
घर-आँगन क्यों नहीं सजाते...
माना तन की पराधीनता
की बेड़ी तो टूट गई है...
भारत के मन की आज़ादी
लेकिन पीछे छूट गई है...
सत्य सनातन पुरखों वाला
वैज्ञानिक संवत अपना है...
क्यों ढोते हम अँग्रेजी को
जो दुष्फलदाई सपना है...
अपने आँगन की तुलसी को,
अपने हाथों जला दिया है...
अपनी संस्कृति, अपना गौरव,
हमने सब कुछ लुटा दिया है...
सर्वश्रेष्ठ है संवत अपना
हमको इसका ज्ञान नहीं हैं...



https://www.facebook.com/potabhai.blogspot.in

Popular posts from this blog

देश भक्ति शायरी

हो समय ने फिर ललकारा है---

देशभक्त कलाम को प्रणाम....